वेत्रवती के तट पर प्रायश्चित्त कर्म, दशविध स्नान व तर्पण के साथ हुआ श्रावणी उत्सर्ग उपाकर्म पर्व का आयोजन

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ओरछा। धार्मिक नगरी के वेतवती नदी के पावन तट पर स्थित बेतवेश्वर महादेव मंदिर पर श्रावण शुक्ल पूर्णिमा गुरुवार को श्रीरामराजा गुरुकुल संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य वरूण तिवारी के आचार्यत्व मैं विद्वान पंडितों द्वारा आचार्य केशव लोक कल्याण समिति के तत्वावधान में विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी श्रावणी उत्सर्ग उपाकर्म पर्व का आयोजन किया गया । यह धार्मिक आयोजन गुरुवार प्रातः 7:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक चला।

आयोजन के तहत सर्वप्रथम वेत्रवती नदी के तट पर प्रायश्चित्त कर्म, दशविध स्नान तथा देव, ऋषि, मनुष्य एवं पितृ तर्पण की धार्मिक विधियां संपन्न कराई गई। इसके बाद बेतवेश्वर महादेव मंदिर में ऋषि पूजन, यज्ञोपवीत अभिमंत्रण, हवन एवं प्रसादी वितरण किया गया।

आचार्य वरूण तिवारी ने बताया कि इस धार्मिक पर्व में द्विज संज्ञा प्राप्त ऋषिकुमार, वैदिक ब्राह्मण तथा संध्योपासना करने वाले द्विजजन शामिल होते हैं।

श्रावणी उपाकर्म पर्व वैदिक परम्परा में मुख्यतः वेदाध्ययन यज्ञोपवीत नवीनीकरण, ऋषि-स्मरण से जुड़े धार्मिक कर्तव्यों के लिए मनाया जाता है।

श्री रामराजा गुरुकुल संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य वरुण तिवारी ने आगे बताया कि श्रावणी उपाकर्म क्यों मनाते हैं?
वेदाध्ययन का पुनः आरम्भ
वर्षा ऋतु में श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर वेदाध्ययन से जुड़े कर्मों का विशेष विधान है। उपाकर्म का अर्थ ही है—वेदाध्ययन के लिए पुनः आरम्भ/उपक्रम करना।
ऋषियों का स्मरण और पूजन
इस दिन वेदों के ऋषियों तथा परम्परा में प्राप्त ज्ञान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इसलिए इसे ऋषि-तर्पण/ऋषि-स्मरण से भी जोड़ा जाता है।

यज्ञोपवीत परिवर्तन:-
अनेक वैदिक परम्पराओं में इस दिन विधिपूर्वक नवीन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इसका उद्देश्य अपने वैदिक कर्तव्यों और आचरण की पुनः स्मृति कराना है।
पूर्व में हुए दोषों के प्रायश्चित्त पंचगव्य का पान तथा भाव उपाकर्म के अवसर पर प्रायश्चित्त तथा शुद्धिकरण संबंधी कर्म किए जाते हैं, जिससे साधक अपने अध्ययन और धार्मिक आचरण को पुनः व्यवस्थित करता है।

वेद, गुरु और ऋषि-परम्परा के प्रति श्रद्धा
यह पर्व केवल धागा बदलने का दिन नहीं है, बल्कि गुरु–ऋषि–वेद परम्परा के प्रति श्रद्धा और अपने स्वाध्याय-व्रत को पुनः दृढ़ करने का अवसर है।..

इस अवसर पर यज्ञोपवीत धारण करने वाले 51 वटुकों ने आचार्य वरुण तिवारी की संन्निधि में वैदिक रीती के अनुसार यह पर्व हर्षउल्लास से मनाया।

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