करेरा के चित्रकार रौनक राय की मुंबई में एकल प्रदर्शनी

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करेरा/शिवपुरी। मध्य प्रदेश के छोटे शहर करेरा से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कला जगत में अपनी पहचान बना रहे चित्रकार रौनक राय इन दिनों मुंबई में अपनी एकल चित्र प्रदर्शनी के जरिए कला प्रेमियों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। ‘Shyama — Black Mother’ नाम से आयोजित यह प्रदर्शनी मुंबई के The Foyer Chapel में 13 अगस्त से शुरू हुई है और 8 सितंबर 2026 तक जारी रहेगी।

करेरा जैसे छोटे शहर से निकलकर मुंबई जैसे महानगर के कला परिदृश्य में एक महीने की एकल प्रदर्शनी आयोजित होना स्थानीय कला प्रेमियों और करेरा के लोगों के लिए गौरव की बात है। खास बात यह है कि इस बार रौनक राय के कार्यों को गैलरी ने स्वयं प्रस्तुत और प्रमोट किया है।

रौनक राय के लिए यह मुंबई में तीसरा शो है, लेकिन उनके अनुसार यह उनके जीवन का पहला ऐसा महत्वपूर्ण शो है, जिसे किसी गैलरी ने स्वयं प्रस्तुत करने के साथ-साथ प्रमोट भी किया है। एक कलाकार के लिए इसे वे अपने कला सफर की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते हैं।

वर्षों के संघर्ष के बाद मिली नई राह

रौनक राय का मुंबई तक पहुंचने का सफर संघर्षों से भरा रहा है। छोटे शहर से निकलकर कला के क्षेत्र में पहचान बनाने के दौरान उन्हें कई बार निराशा और असफलता का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने चित्र बनाना और अपनी कला को दर्शकों तक पहुंचाना जारी रखा।

जून 2026 में मुंबई में एक असफल शो के बाद रौनक निराश होकर अपने चित्रों के साथ करेरा लौट रहे थे। इसी दौरान संयोग से उनकी मुलाकात अपने पुराने मित्र शनि से हुई। रौनक की स्थिति देखकर शनि ने उनके लिए प्रयास करने का निर्णय लिया।

शनि स्वयं इंदौर के एक प्रगतिशील कलाकार हैं और अपनी मेहनत से मुंबई के कला जगत में पहचान बना चुके हैं। उन्होंने रौनक राय के चित्रों को मुंबई की The Foyer Chapel तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गैलरी ने रौनक के काम को देखा और इसके बाद उनकी एकल प्रदर्शनी आयोजित करने का निर्णय लिया।

इस तरह जून में निराश होकर मुंबई से लौट रहे कलाकार के लिए कुछ ही समय बाद वही मुंबई एक नई संभावना और पहचान का माध्यम बन गई।

कला में शक्ति, संघर्ष और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति

‘Shyama — Black Mother’ प्रदर्शनी मुख्य रूप से मां श्यामा यानी काली की रौनक राय द्वारा की गई कलात्मक व्याख्या पर केंद्रित है।

उनके चित्रों में देवी केवल पौराणिक पात्र के रूप में दिखाई नहीं देतीं, बल्कि वे शक्ति, साहस, संघर्ष, प्रतिरोध और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के प्रतीक के रूप में सामने आती हैं।

रौनक की कला में शाक्त परंपरा, लोक एवं आदिवासी आस्थाओं, पौराणिक कथाओं और समकालीन सामाजिक अनुभवों का मेल दिखाई देता है। उनके लिए देवी धार्मिक प्रतीक होने के साथ-साथ कठिन परिस्थितियों में संघर्ष और संरक्षण की शक्ति का स्वरूप भी हैं।

उनके चित्रों में व्यक्तिगत संघर्ष और सामाजिक अनुभवों की झलक भी दिखाई देती है। अलग पहचान के कारण अस्वीकार, दबाव और संदेह जैसी परिस्थितियों के प्रति प्रतिरोध उनकी कला का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

करेरा से ग्वालियर और फिर मुंबई तक का सफर

रौनक राय का जन्म वर्ष 1987 में करेरा में हुआ। बुंदेलखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण में उनका बचपन बीता। लोक परंपराएं, धार्मिक कथाएं, मंदिर, त्योहार और आम लोगों का जीवन उनके शुरुआती अनुभवों का हिस्सा रहे।

बचपन से ही रौनक चित्र बनाया करते थे। हालांकि उस समय उन्होंने नहीं सोचा था कि चित्रकला आगे चलकर उनके जीवन की पहचान बनेगी।

उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब उन्हें जवाहर नवोदय विद्यालय में पढ़ने का अवसर मिला। वहां कला शिक्षकों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें चित्रकला के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। इसी मार्गदर्शन ने उनके बचपन के शौक को धीरे-धीरे गंभीर कलात्मक यात्रा में बदल दिया।

इसके बाद उन्होंने ग्वालियर के Government College of Fine Arts से चित्रकला में MFA की डिग्री हासिल की। भोपाल स्थित भारत भवन में यूसुफ सर के मार्गदर्शन ने भी उनकी कला यात्रा को समृद्ध किया।

फिगरेटिव पेंटिंग से तांत्रिक कला तक

रौनक राय मुख्य रूप से फिगरेटिव पेंटिंग के कलाकार हैं। मानव आकृतियों के माध्यम से वे भावनाओं, संघर्ष, स्मृति, करुणा, आशा और जीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त करते हैं।

उनके कार्यों में रामायण, महाभारत, शिव, कृष्ण, काली और दुर्गा जैसे पौराणिक विषयों के साथ महिला सशक्तिकरण, सामाजिक जागरूकता, हिंसा, पर्यावरण, आध्यात्मिकता और समकालीन समाज के नैतिक प्रश्न भी दिखाई देते हैं।

उन्होंने तांत्रिक कला, विशेषकर भैरवी तंत्र से जुड़े प्रतीकों, रेखाओं, ज्यामितीय संरचनाओं, बिंदुओं और लयात्मक आकृतियों को भी अपनी कला भाषा का हिस्सा बनाया है। इनके माध्यम से वे आध्यात्मिक चेतना और ऊर्जा को चित्रों में व्यक्त करने का प्रयास करते हैं।

‘यह मंजिल नहीं, एक नई शुरुआत है’

रौनक राय के लिए हर नई पेंटिंग एक उपलब्धि का अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत है। उनका मानना है कि कला के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना आसान नहीं होता। खासकर छोटे शहर से निकलकर बड़े कला केंद्रों तक पहुंचने के लिए लगातार मेहनत, धैर्य और संघर्ष की जरूरत होती है।

मुंबई में मिली यह एकल प्रदर्शनी उनके लिए मंजिल नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। वे आने वाले समय में भी लगातार मेहनत और लंबे संघर्ष के लिए तैयार हैं।

बचपन में करेरा में चित्र बनाने से शुरू हुई यात्रा, नवोदय विद्यालय के कला शिक्षकों के प्रोत्साहन से आगे बढ़ी और ग्वालियर तथा भोपाल से होते हुए आज मुंबई के कला परिदृश्य तक पहुंच चुकी है।

करेरा के इस कलाकार की ‘Shyama — Black Mother’ एकल प्रदर्शनी 8 सितंबर 2026 तक The Foyer Chapel, मुंबई में जारी रहेगी।

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