कार्य में भगवान का भाव मिला दो तो खाना प्रसाद बन जाता है:- देवी चित्रलेखा जी

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करैरा । श्री बगीचा धाम क्षेत्र में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस देवी चित्रलेखा जी की दिव्य वाणी ने समस्त वातावरण को भक्तिमय बना दिया। सर्वप्रथम आरती हुई, फिर देवी जी ने हरे कृष्ण हरे कृष्ण… हरे राम हरे राम का सामूहिक महामंत्र गूँज उठा और सारा पांडाल प्रेम रस में डूब गया। देवी जी ने मार्मिक उदाहरण देते हुए बताया कि एक व्यक्ति ने साधारण दिखने वाली अंगूठी को पहले लोहे का समझकर फेंक दिया गया, पर जब सुनार ने देखा तो पता चला कि उसमें करोड़ों का हीरा जड़ा है। ठीक वही भागवत के साथ हम करते हैं – जब तक इसकी असली कीमत नहीं जानते, इसे अलमारी में धूल फाँकने देते हैं। जिस दिन हीरे का महत्व समझ आया, उसी दिन तिजोरी में रुई बिछाकर रखने लगे। आज भिंड से पूज्य भूमिया सरकार भी पधारकर कथा की शोभा बढ़ा रहे थे।


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जीवन में केवल कर्म हमारे हाथ – बाकी सब प्रभु की माया

देवी जी ने समझाया – “जन्म भी हमारे वश में नहीं, मृत्यु भी नहीं, लाभ-हानि, यश-अपयश कुछ भी हमारे हाथ में नहीं। केवल कर्म हमारे अधिकार में है, जैसा बोओगे वैसा काटोगे।” इसके बाद “हम तुम्हारे थे प्रभु जी, तुम हमारे हो…” भजन हुआ तो सारा पांडाल नाच उठा, देवी जी ने मुस्कुराते हुए कहा – “हर कार्य में भगवान का भाव मिला दो तो खाना प्रसाद, पानी चरणामृत, भूख व्रत, चलना परिक्रमा और गीत भजन बन जाता है। भक्ति की एक बूँद से सारा जीवन सुगंधित हो जाता है।” यह सुनकर सैकड़ों आँखें एक साथ नम हो गईं।


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संप्रदाय की दीवारें गिराकर , प्रेम का मंदिर बनाने की अपील की

आज के कलयुगी झगड़ों पर करारा प्रहार करते हुए देवी जी ने हास-व्यास के साथ सच्चाई उजागर की। दो शिष्यों की कहानी सुनाई जो गुरु के पैर दबाते-दबाते आपस में लड़ पड़े। फिर एक मंदिर का प्रसंग – कन्हैया बिठाए तो राम भक्त नाराज, राम जी बिठाए तो कृष्ण भक्त दूर, अंत में महादेव को बिठाया तो दोनों पक्ष फिर अलग। कमेटी वालों ने संत से पूछा, संत ने हँसकर कहा – “मंदिर हटाओ, होटल खोल दो, वहाँ सब एक प्लेट में खाते हैं, न धर्म देखते हैं न जाति!” देवी जी ने करबद्ध निवेदन किया – “मंदिर में लड़ते हो, धर्म पर लड़ते हो, पर होटल पर सब साथ बैठकर चाय पीते हैं। प्रेम बाँटो, दीवारें मत खड़ी करो। सनातन धर्म में भगवानों को अलग करोगे तो धर्म टूटेगा इसलिए सब एक है तभी धर्म मजबूत होगा ।

⁠⁠⁠⁠अपने ग्रंथों का सम्मान ही सनातन का सम्मान है

अंत में देवी जी ने कई अंधविश्वासों को चूर-चूर किया। बोलीं – “महाभारत घर में रखने से लड़ाई होती है? अरे, जिन घरों में महाभारत नहीं है वहाँ क्या सास-बहू में रामायण चल रही है? महाभारत विजय का महाग्रंथ है, इसे घर में अवश्य रखें, पढ़ें, सुनें। रामचरितमानस हो, विष्णु पुराण हो या भागवत – हर ग्रंथ में परमात्मा का वास है। उन्होंने कहा एक बार हमसे एक भक्त ने पूछा आप विवाहित हैं फिर गले में तुलसी कंठी क्यों देवी जी हँस पड़ीं कंठी वैधव्य या अविवाह की निशानी थोड़े है! यह भक्ति का सबसे सुंदर शृंगार है, जैसे सिंदूर, मंगलसूत्र, चूड़ी। शास्त्र पढ़ोगे तो हर प्रश्न का उत्तर स्वयं मिल जाएगा।”

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