◆बारिश में त्रिपाल या पॉलीथिन के नीचे खड़े होकर करना पड़ता है अंतिम संस्कार
करैरा। करैरा जनपद के अंतर्गत आने वाली दिदावली ग्राम पंचायत में स्थित एकमात्र श्मशान घाट की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि यह ग्रामीणों के लिए नर्क जैसी पीड़ा का कारण बन गया है। पुराने इतिहास वाले इस गांव में, जहां आबादी करीब 2,000 से अधिक है, श्मशान घाट पर न तो कोई छत है और न ही बैठने की कोई व्यवस्था। खासकर मानसून के मौसम में, जब मूसलाधार बारिश होती है, तो यहां अंतिम संस्कार करने वाले परिवारों को असहनीय कष्ट झेलना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि त्रिपाल या पॉलीथीन की आड़ में शव को जलाने का काम चलता है, लेकिन यह अस्थायी उपाय भी अपर्याप्त साबित होता है। बीते दिनों एक घटना ने तो सबकी रूह कांप दी, जब एक महिला के अंतिम संस्कार के दौरान परिजनों को हाथों से पॉलीथीन थामे रहना पड़ा, ताकि बारिश का पानी शव पर न गिरे। यह दृश्य न केवल दुखद है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की भी परीक्षा लेता है। गांव के बुजुर्ग सीता राम ठाकुर बताते हैं, “हमारे पूर्वजों ने इस जगह को पवित्र मानकर चुना था, लेकिन आज यह जगह अपमान का प्रतीक बन गई है।” श्मशान घाट की यह दुर्दशा न केवल धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को भी खतरे में डाल रही है, क्योंकि खुली जगह पर जलने वाले शवों से फैलने वाली गंध और धुआं आसपास के घरों तक पहुंच जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी योजनाओं के बावजूद, यहां का विकास पूरी तरह उपेक्षित रहा है। मध्य प्रदेश सरकार की हालिया घोषणा के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में हर ग्राम पंचायत में श्मशान घाटों का सुव्यवस्थित विकास किया जाना है, लेकिन दिदावली जैसे गांवों में यह योजना कागजों तक सीमित दिखाई दे रही है। यह स्थिति न केवल स्थानीय निवासियों की निराशा बढ़ा रही है, बल्कि पूरे क्षेत्र में एक उदाहरण प्रस्तुत कर रही है कि कैसे बुनियादी सुविधाओं की कमी जीवन के अंतिम संस्कार को भी कष्टमय बना देती है। कुल मिलाकर, यह श्मशान घाट अब एक जीवंत स्मारक बन चुका है

अंतिम संस्कार के समय न लोगो को बैठने की व्यवस्था है और ना ही शव को रखने की जगह
दिदावली ग्राम पंचायत के श्मशान घाट का बुनियादी ढांचा इतना जीर्ण-शीर्ण है कि यहां न तो कोई टीन की छत नजर आती है और न ही बैठने के लिए कोई पटरी या बेंच। अंतिम संस्कार के दौरान सैकड़ों ग्रामीण इकट्ठा होते हैं, लेकिन उनके लिए कोई आश्रय स्थल नहीं है, जिससे वे घंटों खड़े रहने को मजबूर हो जाते हैं। सरकारी मानकों के अनुसार, हर श्मशान घाट पर न्यूनतम 500 वर्ग मीटर की जगह पर छत, बैठने की व्यवस्था और जलाशय होना अनिवार्य है, लेकिन यहां तो बेसिक सुविधाओं का भी अभाव है। ग्रामीण लल्ला राम ने बताया, “जब शव जल रहा होता है, तो परिजन भावुक होकर रोते हैं, लेकिन बारिश की बूंदें उनके आंसुओं को मिला देती हैं। कोई जगह नहीं जहां वे शांति से बैठ सकें।” यह कमी न केवल शारीरिक थकान बढ़ाती है, बल्कि मानसिक आघात को भी गहरा करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी जगहों पर अपर्याप्त ढांचा दुर्घटनाओं को न्योता देता है, जैसे फिसलन भरी जमीन पर गिरना या धुएं से सांस की समस्या। पंचायत स्तर पर उपलब्ध होने वाले 14वें वित्त आयोग के फंड्स से इन सुविधाओं को विकसित किया जा सकता है, लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण धन का दुरुपयोग हो रहा है। एक सर्वे के अनुसार, मध्य प्रदेश के 40 प्रतिशत ग्रामीण श्मशान घाटों में इसी तरह की समस्याएं हैं, जो राज्य सरकार की ‘स्मार्ट विलेज’ योजना को खोखला साबित करती हैं। दिदावली के युवा किसान मोहन सिंह कहते हैं, “हम खेतों में दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन मृत्यु के समय ऐसी सुविधा न मिले, तो जीवन का कोई मतलब नहीं रह जाता।” इसके अलावा, यहां जलने के लिए लकड़ी की व्यवस्था भी अभावग्रस्त है, जिससे परिवारों को दूर-दराज से लकड़ी मंगानी पड़ती है।

श्मशान घाट का रास्ता भी खराब,शव ले जाने में आती है समस्या
श्मशान घाट तक पहुंचने वाला रास्ता इतना उबड़-खाबड़ और टूटा-फूटा है कि बारिश के दिनों में यह दलदल में बदल जाता है, जिससे शव के साथ पैदल आने वाले लोगों को भारी कठिनाई होती है। दिदावली ग्राम पंचायत का यह एकमात्र श्मशान घाट गांव के किनारे पर स्थित है, लेकिन बिना मरम्मत के रोड के कारण कई बार लोग गड्डों में फस जाते हैं । जनपद प्रतिनिधि कोक सिंह परिहार ने बताया कि यहां हमारे एक मिलने वाले के अंतिम संस्कार में आया था बारिश हो रही थी मेरी बाइक गड्डों में फस गई थी ” इसके साथ ही, श्मशान घाट की बाउंड्री दीवारें पूरी तरह ढह चुकी हैं, जिससे जंगली जानवरों का प्रवेश आसान हो गया है। यह स्थिति न केवल सुरक्षा को खतरे में डालती है, बल्कि पवित्रता को भी भंग करती है। मध्य प्रदेश पंचायत राज विभाग के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, हर श्मशान घाट के चारों ओर कम से कम 4 फीट ऊंची बाउंड्री अनिवार्य है, लेकिन यहां तो कंक्रीट के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। गांव के एक युवा राजेश कुमार बताते हैं, “हमने कई बार प्रशासन को पत्र लिखे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाउंड्री न होने से कुत्ते शव के पास आ जाते हैं, जो डरावना होता है। ग्रामीणों की मांग है कि तत्काल रोड की मरम्मत और बाउंड्री निर्माण हो, ताकि पहुंच आसान बने और संस्कार सम्मानजनक तरीके से संपन्न हो सकें। यह मुद्दा न केवल स्थानीय है, बल्कि पूरे करैरा जनपद में समान समस्याओं को उजागर करता है।

ग्रामीणों की बार-बार गुहार के बावजूद भी नहीं हुई सुनवाई
दिदावली ग्राम पंचायत के ग्रामीणों ने श्मशान घाट की दयनीय स्थिति के खिलाफ जनप्रतिनिधियों से लेकर जिला प्रशासन तक गुहार लगाई है, लेकिन कहीं से भी कोई राहत नहीं मिली। विधायक, सांसद, जिला पंचायत सदस्य और सरपंच सभी को ज्ञापन सौंपे गए, लेकिन नतीजा शून्य रहा। राज्य सरकार की 5वें राज्य वित्त आयोग की योजना के तहत अधोसंरचना विकास के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध है।  ग्रामीणों ने आरोप लगाया, “जनप्रतिनिधि चुनाव के समय वादे करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद नींद ही नहीं खुलती। हमारी आवाज दबा दी जाती है।” इस उदासीनता का परिणाम यह है कि अन्य गांवों में जहां 2-3 श्मशान घाट विकसित हैं, वहीं दिदावली जैसे पुराने गांव उपेक्षित हैं। गांव की एक विधवा, ने बिना नाम बताये , भावुक होकर बताया कि “मेरे पति के अंतिम संस्कार के समय हुई बारिश ने मुझे आज भी सताती है। अगर सुविधा होती, तो शायद दर्द कम होता।” ग्रामीण अब सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से उच्च न्यायालय का रुख करने की सोच रहे हैं। यह प्रशासनिक लापरवाही न केवल विश्वास को तोड़ रही है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर रही है। तत्काल जांच और कार्रवाई की आवश्यकता है, ताकि ग्रामीणों का दर्द कम हो और श्मशान घाट एक सम्मानजनक स्थल बने।

इनका कहना है –
बारिश के रुकते ही काम शुरू करवा देंगे एक सुन्दर श्मशान घाट का निर्माण होगा प्रस्ताव डलवा दिया है सारी व्यवस्था ग्रामीणों को मिलेगी – पुष्पेंद्र जाटव जनपद अध्यक्ष करैरा
आपने बताया है हम दिखवा लेते है क्या स्थिति है जल्द काम करवा देंगे- हेमंत सूत्रकार जनपद सीईओ करैरा
