ब्राह्मणों ने वेतवा घाट पर वेतवेश्वर महादेव की छाया में मनाया श्रावणी उपाकर्म

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ओरछा। श्री राम राजा सरकार की नगरी ओरछा में माँ वेत्रवती ( वेतवा ) के घाट पर वेतवेश्वर महादेव की छाया में श्रावणी उपाकर्म आचार्य वरुण तिवारी के सानिध्य में मनाया गया। जिसमे प्रायश्चित संकल्प , दशविध स्नान , देव ऋषि मनुष्य पितृ तर्पण , ऋषि पूजन, यज्ञोपवीत संस्कार , होम कार्य के साथ सानंद संपन्न हुआ।                                    

श्रावणी पर्व का महत्व:

ऋषि तर्पण:

श्रावणी पूर्णिमा को ऋषि तर्पण भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है ऋषियों को संतुष्ट करना। इस दिन, वेद-वेदांगों के ज्ञाता, ब्राह्मण, और अन्य लोग नदियों के तट पर एकत्रित होकर ऋषियों को तर्पण करते हैं और अपने ज्ञान-कर्म के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. 

यज्ञोपवीत संस्कार:

प्राचीन काल में, ऋषि-मुनि इसी दिन से वेद पारायण शुरू करते थे। गुरुकुलों में भी इसी दिन छात्रों का यज्ञोपवीत संस्कार होता था और वेद अध्ययन प्रारंभ होता था. 

ज्ञान-विज्ञान का पर्व:

श्रावणी पर्व को ज्ञान की साधना का पर्व माना जाता है। यह पर्व सद्ज्ञान, बुद्धि और विवेक की वृद्धि के लिए मनाया जाता है. 

राष्ट्र रक्षा का संकल्प:

इस दिन, लोग नदियों में खड़े होकर वैदिक और पौराणिक परंपराओं का स्मरण करते हुए राष्ट्र रक्षा और धर्म रक्षा के लिए संकल्प लेते हैं. 

श्रावणी पर्व से जुड़ी पौराणिक कथाएं:

इंद्र और रक्षासूत्र:

एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हो रहा था, तब इंद्राणी (इंद्र की पत्नी) ने इंद्र की रक्षा के लिए श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षासूत्र बांधा था। उस रक्षासूत्र की शक्ति से इंद्र को विजय प्राप्त हुई. 

समुद्र मंथन:

एक अन्य कथा के अनुसार, श्रावण मास में समुद्र मंथन हुआ था, जिससे हलाहल विष निकला था। भगवान शिव ने उस विष को ग्रहण किया था, जिससे उनका शरीर गर्म हो गया था। देवताओं ने उन पर जल अर्पित करके उन्हें शांत किया था। तभी से शिव भक्त सावन में जल चढ़ाते हैं और कांवड़ यात्रा की परंपरा शुरू हुई. 

राजा तुंगध्वज:

एक कथा राजा तुंगध्वज से भी जुड़ी है। एक बार, शिकार के दौरान थके होने पर, राजा ने बरगद के पेड़ के नीचे भगवान सत्यनारायण की पूजा करते हुए लोगों को देखा। अहंकार के कारण, राजा ने पूजा में भाग नहीं लिया और बिना प्रसाद लिए ही लौट गया। बाद में, उसे अपने राज्य पर दूसरे राजा के आक्रमण का सामना करना पड़ा। तब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने भगवान सत्यनारायण से क्षमा मांगी। भगवान ने उसे क्षमा कर दिया और उसके राज्य को वापस दिला दिया. 

रक्षा बंधन का पर्व:

श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही रक्षा बंधन का त्योहार मनाया जाता है, जिसमें बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और भाई अपनी बहनों को रक्षा का वचन देते हैं.

यह पर्व भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक है, लेकिन इसके पीछे पौराणिक कथाएं और धार्मिक महत्व भी जुड़े हुए हैं. 

श्रावणी पर्व, ज्ञान, रक्षा, और प्रेम का पर्व है, जो भारतीय संस्कृति और परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है,

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