◆ कलेक्टर के आदेश को धता बता रहे है अधीनस्थ अधिकारी
करैरा। शिवपुरी जिले में झोलाछाप डॉक्टरों की लापरवाही से हो रही मौतों को रोकने के लिए कलेक्टर रविंद्र चौधरी ने 27 फरवरी 2025 को एक पत्र जारी कर जिले में 16 विशेष जांच टीमों का गठन किया था। इनमें करैरा, सिरसौद, और दिनारा की टीमें भी शामिल थीं, जिन्हें झोलाछाप डॉक्टरों पर निगरानी और कार्रवाई का जिम्मा सौंपा गया था। लेकिन इसके बावजूद, करैरा के अमोल पठा गांव में एक 8 वर्षीय बच्चे सुखवीर आदिवासी की मौत ने स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुखवीर, उड़वाह गांव निवासी कैलाश आदिवासी का बेटा था। कैलाश ने बताया कि सुखवीर को तेज बुखार होने पर वे उसे अमोल पठा बस स्टैंड के पास पप्पू बघेल के क्लीनिक ले गए। पप्पू ने सैंपल जांच के बाद मलेरिया बताया और सुबह 10 बजे से इलाज शुरू किया। पहले एक सिरप दी, जिससे बुखार नहीं उतरा। फिर दूसरी सिरप देने के बाद बच्चे की हालत बिगड़ गई। वह बेसुध हो गया और दोपहर 3 बजे उसकी मौत हो गई। पप्पू ने तब कहा, “यह मेरे समझ से बाहर है, बच्चे को दूसरा अस्पताल ले जाओ।” लेकिन तब तक सुखवीर की जान जा चुकी थी। कैलाश शव लेकर अमोला थाने गए, जहां से उसे पोस्टमॉर्टम के लिए करैरा भेजा गया। इस घटना ने यह साबित कर दिया कि कलेक्टर के आदेश को अधीनस्थ अधिकारी कैसे पालन करते है। सवाल उठता है कि जब जिले में 16 टीमें गठित की गई थीं, तो झोलाछाप डॉक्टरों की मनमानी कैसे जारी है? स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की निष्क्रियता के चलते मासूमों की जान जा रही है। स्थानीय लोगों में भी झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ आक्रोश व्याप्त है और वे पप्पू बघेल जैसे झोला छाप डाक्टरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
